Friday, September 2, 2011

बीस मिनट में तीन किलोमीटर

- राजीव गांधी प्रतिमा से राजेंद्र नगर थाने तक की  सड़क
- महाराष्ट्र के मुसाफिर बोले, हमारे यहां ऐसी सड़क हो तो लोग आग लगा दें


आईए, आपको इंदौर की एक  ऐसी सड़क की सैर कराते हैं, जिसकी लंबाई तीन किमी है और इसे पार करने में वक्त लगता है बीस मिनट। इस बीच में आपकी गाड़ी फंस जाए, तो पता नहीं कितने घंटों बाद आपको राहत मिल सकेगी।
सड़क राजीव गांधी प्रतिमा चौराहा (चौइथराम मंडी चौराहा) से शुरू होती है। शुरू होते ही आपकी परीक्षा शुरू हो जाती है। करीब दो-दो फीट गहरे गड्ढे हैं ओर इनमें पानी भरा हुआ है। जरा सी गफलत हुई और गाड़ी पलट जाएगी। परसों ही गेहूं से भरा ट्रक फंस गया था। उसके एक दिन पहले लकड़ी से लदा ट्राला अड़ गया था। जेसीबी के जोर से गाडिय़ां बाहर आ सकीं। थोड़ा आगे चलते हैं तो गायत्री कुंज और मां विहार कॉलोनी के गेट आते हैं। इनके सामने सड़क टीलों में तब्दील हो चुकी है। थोड़ा आगे जाने पर इंडियन आइल पेट्रोल पंप आता है। यहां जमीन और गड्ढे ही बचे हैं, सड़क लुप्त हो गई है। सरकारी फलबाग के सामने दो गहरे-गहरे ज्वालामुखी के मुंह जैसी आकृतियां जमीन में उकर आई हैं। इनसे बचकर आगे चलें तो राजेंद्रनगर थाने वाले तिराहा है। यहां एक चौथाई मार्ग बचा है।

ट्रक के साथ नापा समय
एमपी-09-एचजी-3788 नंबर के ट्रक में माल लाद कर इंदौर आ रहे नंदू गेहलोत की गाड़ी के साथ पत्रिका टीम ने रास्ता पार करने में खर्च होने वाला समय  नापा। बीस मिनट से अधिक खर्च होने के बाद नंदू अपनी गाड़ी को राजीव गांधी प्रतिमा के सामने लाकर खड़ा कर सका।

रांग साइड घुस रहे लोग
राह इतनी मुश्किल है कि वाहन चालकों को रांग साइड मेें भी घुसना पड़ रहा है। रुट नंबर 2 के सिटी बस चालक ने बताया, ऐसा नहीं करेंगे तो गाड़ी फंस जाएगी। कभी पलट गई तो पता नहीं क्या होगा?

'हमारे यहां इन्हें कुआं कहते हैं
महाराष्ट्र से कारोबार के सिलसिले में इंदौर आए होलाराम ने बताया, इस सड़क पर आकर तो मैं चौंक गया। हमारे यहां इस तरह की सड़क को कुआं कहते हैं। मुझे पहले पता होता कि ऐसे हाल हैं तो इस रुट से कभी नहीं आता।

'रोज महिला-बच्चे फंसते हैं यहां 
गड्ढों के पास रहने वाली सुशीला नागर कहती हैं, हम रोज लोगों को यहां गिरते देखते हैैं। महिलाएं बच्चों को स्कूल छोडऩे जाती हैं। उन्हें देखकर डर लगता है। कई बार फंस जाते हैं, तो हम जाक र मदद करते हैं।

तीन किमी के सफर में छह रुकावटें
(राजीव गांधी प्रतिमा से राजेंद्र नगर थाने तक)

पहली (100 मीटर पर)
चोइथराम मंडी से निकलते ही
दूसरी (500 मीटर पर)
गायत्रीकुंज कॉलोनी के बाहर
तीसरी (1.5 किमी पर)
पुलिया पार करके आया तोलकांटा
चौथी (1.7 किमी पर)
इंडियन आइल पेट्रोल पंप के सामने
पांचवी (2.2 किमी पर)
फलबाग के सामने
छठी (3 किमी पर)
राजेंद्रनगर थाना तिराहे पर

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बंगाली चौराहा से बायपास का बुरा हाल
यही हाल माधवरास सिंधिया प्रतिमा चौराहा (बंगाली चौराहा)से बायपास जाने वाली सड़क का भी है। यहां भी हम आपको बता रहे हैं, बाधाएं। इन्हें पार किए बगैर आप बायपास नहीं पहुंच सकते हैं।

तीन किमी के सफर में पांच रुकावटें
(बंगाली चौराहा से बायपास तक)

पहली (शून्य किमी पर)
चौराहे पर ही सड़क उखड़ी हुई है।
दूसरी (आधे किमी पर)
शहनाई रेसीडेंसी सेकंड के पास, पानी बह रहा है। पैदल चलना सर्कस में करतब दिखाने जैसा है।
तीसरा (पौन किमी पर)
एसआर पेट्रोल पंप के सामने । गिट्टी से सामना होगा।
चौथा (1.25 किमी पर)
शगुन रेसीडेंसी और संचार नगर बस स्टॉप पर।
पांचवा (2 किमी पर)
भारत पेट्रोल पंप के सामने दो गड्ढे जो अचानक सामने आ जाते हैं।
छठा (तीन किमी पर)
शराब की दुकाने के ठीक पहले सड़क के किनारे ध्वस्त हो चुके हैं।
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बारिश के बाद सुधरेंगे हाल
प्र- चोइथराम मंडी से राजेंद्रनगर थाने तक और बंगाली चौराहा से बायपास तक की सड़कें टूट चुकी है?
उ- जी हां, हालात तो उसकी खराब है ही।
प्र- कब बनेगी यह सड़क ?
उ- टेंडर प्रक्रिया शुरू हो गई है। संभवत: बारिश के बाद ही शुरुआत होगी।
प्र- इस बीच में क्या करेंगे?
उ- अभी तो कुछ भी करने का कोई अर्थ नहीं है। गिट्टी डालेंगे तो वह भी टूट जाएगी।
(पीडब्ल्यूडी चीफ इंजीनियर आरके काला से सीधी बात)

पत्रिका  ०२ सितम्बर २०११ 

Wednesday, February 2, 2011

बच्चा अफसर

एक बात समझ से परे है कि कोई भी अफसर या नेता गांव का हाल जानने जाता है तो वहां के बच्चों के ज्ञान की परीक्षा लेना क्यों शुरू कर देता है? बच्चों से पूछा जाता है वर्ग-वर्गमूल में क्या फक्र है, हमारा मुख्यमंत्री कौन है, टीवी पर समाचार सुनते हो या नहीं, आदि-आदि। बच्चे तो बच्चे ठहरे, भले गांव के हों या शहर के। जवाब मिलेजुले आते हैं। जवाब सुनकर अफसर-नेता हंसते हैं और जनसंपर्क अफसर अपने नोट पेड पर इसे दर्ज कर लेते हैं। अखबार भी जनसंपर्क विभाग के प्रेस नोट को तवज्जो देकर हेडलाइन बना देते हैं। बस हो गया काम। जनता में भ्रम बरकरार है कि अफसरों व नेताओं को गांवों का भी ख्याल है।
इंदौर के दो बड़े अफसर भी इन दिनों इसी काम में लगे हैं। संभागायुक्त बसंतप्रताप सिंह व कलेक्टर राघवेंद्र सिंह। राज्य सरकार के फरमान के पालन में दोनों गांवों में रातें गुजार रहे हैं। मैं उनके साथ दौरे पर तो नहीं गया परंतु जो जानकारी मिली है, वह सवाल पैदा करती है। गांवों जाकर वहां के बच्चों के सामान्य ज्ञान को परखने की कोशिश करके अफसर क्या साबित करना चाहते हैं?  कलेक्टर किसी बच्चे से वर्ग व वर्गमूल का अंतर पूछेंगे और वह नहीं बता पाएगा तो इससे क्या साबित हो जाएगा? संभागायुक्त देश के प्रधानमंत्री का नाम पूछेंगे व बच्चा कहेगा शिवराजसिंह चौहान तो क्या हासिल होगा?  यह तो एक तरह से बच्चों व गांव वालों का अपमान है। सालों से इसी जिले के हालात बदलने के लिए नौकरी कर रहे साहबों ने पहली बार गांवों में कदम रखा और बच्चों पर टूट पड़े। उन हालात का जायजा लिए बगैर सवाल दाग दिए, जिनके रहते ये ग्रामीण बच्चे कुछ मामलों में कभी शहरी बच्चों से कंधा मिलाकर खड़े ही नहीं हो सकेंगे।

बेहतर तो यह होता कि वे गांव पहुंचकर पता करते कि गांव में पहुंचने वाल सड़क क्यों नहीं बन पाई? गांव में रोज बिजली क्यों नहीं मिल रही है? गांव में अस्पताल है या नहीं? नहीं है तो बीमार को गांववाले कैसे बचाते हैं? किसान के खेतों के लिए बीज-खाद का क्या इंतजाम है? बच्चा सही जवाब नहीं दे पाए तो अफसर हंसते हैं लेकिन बच्चे की इस दशा के लिए जिम्मेदार कौन है? संभागायुक्त व कलेक्टर दोनों ही भारत की सबसे बड़ी परीक्षा (कथित) आईएएस पास करके सेवा में आए थे तो उन्होंने जो शपथ ली थी, क्या उस पर वे खरे उतर रहे हैं?  उन्हें तो यह भी याद नहीं है कि जिस शहर की सड़कों पर वे लाल-पीली बत्ती की गाड़ी में घुमते हैं, उसी में बच्चों को शिक्षा का अधिकार हासिल नहीं हो पा रहा।

यह जानना रोचक होगा कि कलेक्टर के बच्चे शहर के सबसे महंगे व राजसी स्कूल डेली कॉलेज में पढ़ते हैं।  वे जिन बच्चों की मौखिक परीक्षा ले रहे हैं वे उन गांवों में रहते हैं जहां बिजली, सड़क, पानी, अस्पताल नहीं है। उन्हें पढ़ाने वाले मास्टरजी भी कभी कभी ही गांव में आते हैं।

बेहतर होगा कि गांव के बच्चों की परीक्षा लेने के बजाए जवाबदेही दिखाई जाए। शिक्षा का अधिकार कानून को समझ-पढ़कर अमल में लाने की पहल हो ताकि उन बच्चों को शर्मिंदा न होना पड़े, जिनके गांवों में साहब लोग बरसों-बरस में कभी कभार ही जाते हैं। 

Sunday, October 3, 2010

इंदौर का अंशुल भारतीय शर्लक होम्स

- 42 जटिल  अंतर्राष्ट्रीय क्राइम फाइल्स निपटाकर दुनियाभर कर दिया अचंभित
- अमेरिकन क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल ने किया नामित 



यह स्कॉटिश लेखक आर्थर डॉयल के काल्पनिक जासूसी पात्र शर्लक होम्स की कहानी नहीं है, जो अपने तौर तरीकों के जरिए अपराधियों को गिरफ्त में ले लिया करता था। यह इंदौर के 23 वर्षीय एक नौजवान की हकीकत है। वह जेनेटिक साइंस का छात्र है और भारत के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उसे ओजोन मैन ऑफ द वर्ल्ड  घोषित किया है। उसने भारत में ही रहकर कुछ ही दिनों में 42 अनसुलझे अंतरराष्टरीय अपराधों को सुलझा दिया है। ये अपराध बरसों पुराने थे और कई ख्यात अपराध विशेषज्ञ, पुलिस अधिकारी और फोरेंसिक मेडिसिन के वैज्ञानिक भी इनके आगे हार गए थे। उसकी अविश्वसनीय बुद्धि से अचंभित होकर दुनियाभर से भारत की राष्टï्रपति को बधाई पत्र मिले हैं। इतना ही नहीं उसे अमेरिका ने तो अपनी फोरेंसिक रिसर्च काउंसिल के क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल में नामित तक कर लिया है। 

बात इंदौर के अंशुल जैन की है। कहने को तो वे डब्ल्यूएचओ के डीओई में बतौर जूनियर साइंटिस्ट कार्य कर रहे हैं, लेकिन जेनेटिक साइंस के क्षेत्र में उनकी प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया के जेनेटिक साइंटिस्ट मान चुके हैं। हाल ही में भारत की राष्टï्रपति प्रतिभादेवी सिंह पाटिल ने अंशुल की उपलब्धियों से अभिभूत होकर एक बधाई पत्र भेजा है। मिसाइल मैन एपीजे अब्दुल कलाम ने भी एक व्यक्तिगत पत्र लिखकर अंशुल की इस उपलब्धि को  उत्कृष्ट  बताया है। सुरक्षा के मद्देनजर स्थान की गोपनीयता की शर्त पर अंशुल से 'पत्रिका  से विशेष चर्चा की। उन्होंने बताया कुछ नया करने की मेरी सोच ने ही इस मुकाम तक पहुंचाया है।

यूं सुलझाई क्राइम फाइल्स
अंशुल जेनेटिक साइंटिस्ट हैं और उनका नाता मानव रक्त में मौजूद गुणसूत्रों व डीएनए से है। उन्होंने रक्त और जीन्स के नमूनों के आधार पर ही अपराधियों को बेनकाब किया है। वे बताते हैं यह बहुत ही जटिल प्रक्रिया है और इसमें कई बार कई-कई दिन लग जाते हैं।

हर रात दो घंटे की मशक्कत से मिला मुकाम
अंशुल इंदौर के गुजराती साइंस स्कूल के छात्र रहे हैं। 12 वीं के बाद वर्ष 2006 में उन्होंने मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए 15 परीक्षाएं दी और 12 की मेरिट में स्थान बनाया। वे बताते हैं मैं डॉक्टर बनकर पहले ही खोजी जा चुकी दवाइयों के आधार पर इलाज करके रोजी-रोटी नहीं कमाना चाहता था, इसलिए इस चयन से संतुष्ट नहीं हुआ और इंटरनेट पर शोध की दुनिया को खंगालने लगा। इंटरनेट सर्फिंग के दौरान ही मेरा जैनेटिक साइंस की ओर झुकाव बढ़ा। हर रात दो घंटे में इस विषय पर इंटरनेट पर जाता था और एक दिन ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी की ऑन लाइन सेवा में चला गया। वहां जैनेटिक्स से जुड़ी पहेली थी। उसे हल किया तो मुझे ऑन लाइन परीक्षा के लिए आमंत्रित किया गया। पौन घंटे बाद परीक्षा हुई और मैं चयनित हो गया। बस तभी से जैनेटिक्स मेरी दुनिया बन गया है।

परिवार की अहम भूमिका
अंशुल बताते हैं मेरे ताऊजी डॉ. सुरेंद्र जैन ही मेरे प्रेरणा स्त्रोत रहे हैं। बाद में पूर्व राष्टï्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कमाल ने मुझे प्रेरित किया। मेरी मां कल्पना जैन, पिता डी. जैन, बड़े भाई डॉ. अंकुर जैन ने भी हरकदम पर मेरी हौंसला अफजाई की है, यही वजह है कि मैं आगे बढ़ रहा हूं।
 
'अंशुल, भारत और दुनिया के दूसरे देशों की ओर से मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहती हूं। मेरी इच्छा है कि मैं आपसे मुलाकात करूं।
- प्रतिभा देवीसिंह पाटिल,
राष्ट्रपति (अंशुल को लिखे पत्र से)

'अंशुल, आपकी उपलब्धि न केवल बधाई के योग्य है, बल्कि यह अविश्वसनीय है। इससे भारत के इतिहास में आपका नाम दर्ज हो गया है।
- एपीजे अब्दुल कलाम, पूर्व राष्ट्रपति (अंशुल को लिखे पत्र से)

'भारत में शोध को बढ़ावा नहीं दिया जाता, इसीलिए यहां वैज्ञानिकों की पूछ परख नहीं है। सरकार को इस दिशा में ध्यान देना चाहिए। - अंशुल जैन, साइंटिस्ट, जैनेटिक साइंस




 पूरी दुनिया को बदल डालेगा जेनेटिक साइंस
- जेनेटिक साइंटिस्ट अंशुल जैन से विशेष भेंट

चॉकलेटी हीरो जैसे नैन-नक्श वाले 23 वर्षीय अंशुल को देखकर कोई नहीं कह सकता कि उनकी अद्भुत बुद्धिमत्ता के कायल होकर चार वर्ष पहले ही भारत के राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें 'ओजोन मैन ऑफ द वर्ल्ड घोषित कर दिया था। तब से आज तक वे जैनेटिक साइंस के क्षेत्र में शोधरत हैं। 'पत्रिका  से विशेष भेंट में उन्होंने बताया जेनेटिक साइंस ऐसा क्षेत्र है, जो कुछ ही वर्षों में पूरी दुनिया को बदल देगा। अभी तो इस विधा में कुछ हुआ ही नहीं है।

प्र- आपको अमेरिका के फोरेंसिक रिसर्च काउंसिल के क्राइम इन्वेस्टिगेशन सेल में नामित क्यों किया गया है?
उ-  जैनेटिक साइंस के क्षेत्र में शोधरत होने के कारण मेरे पास 42 पुराने अपराध सुलझाने के लिए रक्त के नमूने आए थे। मैंने वैज्ञानिक तौर-तरीकों का इस्तेमाल करके इन्हें निपटाया। इसी को देखते हुए अमेरिकन फोरेंसिक रिसर्च काउंसिल ने यह कदम उठाया।

प्र- आपकी सफलता का क्या राज है?
उ- बचपन से ही कुछ नया करने का सोच था। 12 वीं के बाद मैंने चिकित्सा के क्षेत्र में जाने के लिए 15 प्रवेश परीक्षाएं दी थीं और इनमें से 12 में मुझे मेरिट में स्थान मिला था, लेकिन मैं नहीं चाहता था कि डॉक्टर बनकर पूर्व में की गई खोजों के आधार पर लोगों का उपचार करूं। बस मुझे जुनून सवार था कि शोध करना है और मैं आगे बढ़ता चला गया।

प्र- आपके प्रेरणास्त्रोत कौन हैं? 
उ- मेरे ताऊजी डॉ. सुरेंद्र जैन। उन्हें देखकर ही मुझे राह मिली। बाद में मिसाइल मैन डॉ. एपीजे अब्दुल कमाल ने मुझे राह दिखाई। मां कल्पना जैन, पिता डी. जैन, बड़े भाई डॉ. अंकुर जैन ने भी हरकदम पर मेरी हौंसला अफजाई की।

प्र- जैनेटिक साइंस की ओर कैसे मुड़े?
उ- मैंने इंदौर के गुजराती साइंस कॉलेज से 12 वीं तक की पढ़ाई की। इसके बाद इंटरनेट सर्फिंग के दौरान ही जैनेटिक साइंस की ओर झुकाव बढ़ा। हर रात दो घंटे में इस विषय पर नेट पर जाता था और एक दिन ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी की ऑन लाइन सेवा में चला गया। वहां जैनेटिक्स से जुड़ी पहेली थी। उसे हल किया तो मुझे ऑन लाइन परीक्षा के लिए आमंत्रित किया गया। पौन घंटे बाद परीक्षा हुई और मैं चयनित हो गया। बस तभी से जैनेटिक्स मेरी दुनिया बन गया है।


प्र- जैनेटिक साइंस के क्षेत्र में अभी आप क्या काम रहे हैं?
उ- यह एक गोपनीय मसला है, परंतु इतना जरूर है कि इस क्षेत्र में अभी तो कुछ हुआ ही नहीं है। मनुष्य के बारे में जो भी आप सोच सकते हैं, उसे जैनेटिक्स से हासिल किया जा सकता है। कुछ ही वर्षों में इससे पूरी दुनिया में तब्दीली हो जाएगी।

प्र- इस दिशा में भारत सरकार के प्रयासों के बारे में बताएं?
उ- सबसे बड़ा प्रयास यह है कि मुझे देश में ही रहकर काम करने का मौका मिल गया। वैसे, भारत में शोध को बढ़ावा नहीं दिया जा रहा है, यही वजह है कि छात्र इससे दूर होते जा रहे हैं। यहां लोग उन बातों को शोध बता रहे हैं, जो पहले ही खोजा जा चुका है।

प्र- भारत की शिक्षा व्यवस्था के बारें में आपकी क्या राय है?
उ- जब तक इसे पूरी तरह बदला नहीं जाएगा, तब तक हम दुनिया के साथ खड़े नहीं हो सकेंगे। वर्तमान में स्कूल-कॉलेज व्यापार का केंद्र बने हुए हैं। जहां से ज्ञान गंगा बहना चाहिए, वहां से गंदे नाले बह रहे हैं।

प्र- भारतीय राजनैतिक व्यवस्था पर आपकी क्या राय है?
उ- कानून बनाने में नेताओं को मास्टर्स डिग्री हासिल है और कानून तोडऩे में पीएचडी। फौरी तौर पर कहूं तो नेताओं को देश की चिंता ही नहीं है। वे न तो यह समझने को तैयार है कि दुनिया बदल रही है और न ही यह कि देश की प्रतिभाएं बोथरी हो रही हैं। इससे अधिक तो क्या कहूं?

प्र- आपको अत्यधिक सुरक्षा प्राप्त है, क्या इससे असहज महसूस नहीं करते हैं?
उ- जी नहीं, ऐसा कुछ नहीं है। मैं सुरक्षा को लेकर चिंतित नहीं हूं। मैं अपने और अपने पारिवारिक लोगों के बीच में हमेशा खुश रहता हूं।

प्र- अभी दिन में आप कितने घंटे काम करते हैं?
उ- उसकी कोई सीमा नहीं है। कई बार तो लगातार दो-दो रात काम होता है और कई बार कोई काम नहीं। दरअसल, यह क्षेत्र जुनून से भरा हुआ है और मुझे तो इसी में डूबे रहने में मजा भी आता है।

प्र- आपका सपना?
उ- दुनिया के लोगों को बीमारियों से बचाना। कई नई-नई बीमारियों आ रही हैं और इनसे लडऩे के तरीके भी नए ढूंढना होंगे। हम लोग इन्हीं पर काम कर रहे हैं। मानवता को महफूज रखना ही जीवन का उद्देश्य है। एक खास बात मैं जैन हूं और जैन धर्म के सिद्धांतों की कसौटी पर ही दुनिया की वैज्ञानिक प्रगति को देख रहा हूं। 
 
(नोट: अंशुल को  अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा हासिल है और इसी के मद्देनजर उनके मौजूदा पते और शहर की जानकारी को छुपाया जा रहा है। जो क्राइम फाइल्स उन्होंने सुलझाई हैं, उनके बारे में भी जिक्र नहीं किया गया है।) 

पत्रिका : २-३ अक्टूबर २०१० 

Wednesday, August 25, 2010

मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर पर सरकारी तंत्र का हमला

Dr. Aanad Rai


व्हीसल ब्लोअर यानी भ्रष्टाचार या गड़बडिय़ों को देखकर सरकार को सचेत करने वाला बंदा। लुप्त होती जा रही 'व्हीसल ब्लोअरÓ की इस प्रजाति को बचाने के लिए भारत सरकार संजिदा दिखती है और यही वजह है कि एक ऐसे कानून का मसौदा तैयार किया जा चुका है जिससे यह 'कौमÓ संरक्षित रहेगी। परंतु, मध्यप्रदेश में यह कौम खतरे में है। 'बीमारूÓ की श्रेणी से उबर नहीं पा रहा मध्यप्रदेश 'संगठित और सरकारी भ्रष्टाचारÓ की गिरफ्त में है। ब्यूरोक्रेट जोशी दंपत्ति के पास से मिली अरबों की चल-अचल संपत्ति से इस धारणा पर मुहर भी लगी है। बावजूद इसके राज्य में 'सचेतकÓ को सुरक्षित रखने की कोई कोशिश नजर नहीं आती।

ताजा उदाहरण, एक सरकारी डॉक्टर का है, जिसका नाम आनंद राय है। वे 21 अगस्त की रात तक इंदौर के एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट थे। उस रात एक बजे तक चिकित्सा शिक्षा विभाग भोपाल और कॉलेज डीन के कक्ष में समानांतर बैठकें होती रहीं। आखिर में हुआ कि राज्य में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल को उकसाने के आरोप में डॉ. राय को बर्खास्त कर दिया जाए। आरोप का आधार एक खबर को बनाया गया, जिसमें डॉ. राय ने इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन का संरक्षक होने के नाते कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó 

सवाल है, फिर डॉ. राय को बगैर नोटिस दिए, देर रात तक बैठक करके ताबड़तोड़ बाहर क्यों किया गया? क्या  चिकित्सा शिक्षा विभाग या कॉलेज प्रबंधन की डॉ. राय से जाति दुश्मनी है? क्या डॉ. राय के कहने भर से राज्यभर के जूनियर डॉक्टर हड़ताल कर रहे हैं? क्या डॉ. राय का एक बयान ही उनकी बर्खास्तगी का कारण है या बर्खास्तगी की पृष्ठभूमि पहले से ही तैयार थी ? क्या डॉ. राय व्हिसल ब्लोअर हैं, इसलिए उन्हें सिस्टम से बाहर कर दिया गया?

सवालों का जवाब तलाशने के लिए फ्लैश बैक में जाना होगा। 15 अक्टूबर 2007 को मप्र हाईकोर्ट जस्टिस आरएस झा ने चिकित्सा शिक्षा विभाग को अंतरिम आदेश दिया कि एमजीएम मेडिकल कॉलेज के नेत्र रोग विभाग में सिनीयर रेसीडेंट के पद पर भर्ती के लिए डॉ. आनंद राय की अर्जी भी मंजूर की जाए। इसके बाद ही उन्हें राहत मिली। पहले विभाग का तर्क था कि डॉ. राय ने पीजी डिप्लोमा किया है, इसलिए उन्हें पात्रता नहीं है। डॉ. राय ने भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) के दस्तावेजों के आधार पर कोर्ट में केस दायर किया था। बहरहाल, साक्षात्कार में योग्यता के आधार पर उन्हें चयनित कर लिया गया। इसके बाद यह कहकर नियुक्ति को रोक दिया गया कि याचिका हाईकोर्ट में खत्म नहीं हुई है। डॉ. राय फिर से जबलपुर हाईकोर्ट की शरण में गए। जस्टिस दीपक मिश्रा व आरके गुप्ता की युगलपीठ ने आदेश दिया कि डॉ. राय की याचिका समाप्त हो गई है। मजबूरन, विभाग को 'मुंह बिगाड़करÓ डॉ. राय को नौकरी पर रखा।

डॉ. राय वर्ष 2005 से 07 तक पीजी छात्र थे और तब जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन इंदौर के अध्यक्ष, प्रदेश के महासचिव और प्रवक्ता रहे। उनके दौर में भी हड़तालें हुई और वे सरकार के निशाने पर आए गए। सीनियर रेसीडेंट बनने के बाद उन्हें सिस्टम की खामियां महसूस हुई। उन्हें लगा कि मेडिकल कॉलेजों से जुड़े अस्पतालों में हड़ताल के दौरान भी व्यवस्थाएं माकूल रखने के लिए एमसीआई मापदंड के मुताबिक हर कॉलेज में सीनियर व जूनियर रेसीडेंट की पर्याप्त भर्ती की जाना चाहिए। इसे लेकर उन्होंने 'सूचना का अधिकारÓ का हथियार अपनाया और केंद्र व राज्य सरकार से हजारों जानकारियां बटौरी। इस दौरान ही उनकी विभाग के संचालक, प्रमुख सचिव और मंत्री से वैचारिक टकराहट शुरू हुई। उनके तर्कों को कोई मानने को तैयार नहीं हुआ तो वे जबलपुर हाईकोर्ट पहुंच गए। वहां 6302/2010 नंबर से एक याचिका दायर की, जिसमें रेसीडेंट डॉक्टरों की संख्या, अधिकारों और नियमित नियुक्ति के मामले उठाए गए हैं। याचिका में हाईकोर्ट से दो बार विभागीय अधिकारियों को दो बार नोटिस भी हो भी हो चुके हैं। यह और बात है कि सरकार ने अब तक जवाब नहीं दिया है।

तीन वर्ष में ही डॉ. राय एक व्हिसल ब्लोअर के रूप में उभरे हैं। वे अब तक चिकित्सा शिक्षा विभाग के डॉक्टरों की चल-अचल संपत्ति, राज्य के मेडिकल कॉलेजों की एमसीआई मान्यता, राज्य में स्वास्थ्य नीति की कमी, मेडिकल यूनिवर्सिटी की गैरमौजूदगी के साथ ही सीनियर डॉक्टरों की प्रायवेट प्रेक्टिस, ड्यूटी ओवर्स में डॉक्टरों का ड्यूटी से गायब रहना, सरकारी अस्पतालों में गरीब मरीजों की अनदेखी, मरीजों को प्रायवेट लेबोरेटरी व अस्पतालों में रैफर करना, ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं में पसरा भ्रष्टाचार जैसे कई मसले उठा चुके हैं। उनका हथियार सूचना का अधिकार रहा है।

जुलाई 2010 में डॉ. आनंद राय ने बहुराष्टï्रीय कंपनियों द्वारा विकसित दवाइयों के मरीजों पर परीक्षण (ड्रग ट्रायल) का खुलासा किया। इसके लिए उन्होंने मीडिया और विधायकों को जरिया बनाया। मीडिया ने खबरें प्रकाशित की और विधायकों ने विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे। करोड़ों अरबों के ड्रग ट्रायल के खेल की पोल खुलने से पूरे राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं और डॉक्टरों के 'नोबलÓ चरित्र पर प्रश्नचिह्न उठ खड़ा हुआ। सरकार अनुत्तरित रही और राज्य के आर्थिक अपराध अनुसंधान ब्यूरो व लोकायुक्त ने ट्रायल में लिप्त कुछ नामचीन डॉक्टरों की जांच शुरू कर दी। जैसा कि राज्य में होता आया है, सरकार ने लीपापोती शुरू कर दी। मरीजों और सरकार की आंखों में साफ-साफ धूल छोंकने वाले डॉक्टरों को 'शोधार्थीÓ (रिसर्चर) बताया गया। हालांकि, सरकार का यह कृत्य जनता को हजम नहीं हो रहा है। डॉ. राय स्वास्थ्य समर्पण सेवा समिति नाम के एक संगठन से भी जुड़े हैं। इसी संगठन के जरिए उन्होंने 'ट्रायलÓ मुद्दे को उठाया है।

ड्रग ट्रायल के बाद से ही पूरा सरकारी तंत्र डॉ. राय को 'निपटानेÓ की जोड़तोड़ में था। अगस्त में शुरू हुई जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल में तंत्र कामयाब हो गया। डॉ. राय इंदौर जूनियर डॉक्टर्स एसोसिएशन के संरक्षक हैं और इसी नाते हड़ताल के दौरान उन्होंने एक-दो बार मीडिया में कहा था 'मैं जूडॉ की मांगों का नैतिक समर्थन करता हूं।Ó बस फिर क्या था, इस बयान को आधार बनाकर उन्हें 'बाहरÓ का रास्ता दिखा दिया। हद तो यह हो गई कि उनकी बर्खास्तगी को एक विज्ञापन के जरिए प्रमुख अखबारों में प्रकाशित करवाया गया, जिसमें संभवत: कुछ लाख रुपए खर्च हुए होंगे। 

 प्राकृतिक न्याय के तहत डॉ. राय ने फिलहाल कॉलेज को एक नोटिस दिया है, निश्चत तौर पर इसका उन्हें इसका नकारात्मक जवाब मिलेगा। इसके बाद ही वे कोर्ट की दहलीज पर जाकर न्याय मांग सकते हैं। खुशी इस बात की है कि डॉ. राय निराश नहीं हुए हैं। उनका कहना है मुझे सिर्फ और सिर्फ ड्रग ट्रायल खुलासे के कारण हटाया गया है। सरकार संदेश देना चाहती है कि सरकारी तंत्र के भीतर जो व्यक्ति 'आवाजÓ उठाऐगा, उसे इसी तरह दबा दिया जाएगा। मैं इससे घबराने वाला नहीं हूं, न्याय पाकर ही दम लूंगा।  

इस जिंदा उदाहरण से साबित होता है ...
मध्यप्रदेश में व्हीसल ब्लोअर सरकारी तंत्र के निशाने पर हैं।

Saturday, April 3, 2010

तो क्या सो रहे थे कोर्ट?

कानून की देवी की आंखों पर पट्टी है, फिर भी कहा जाता है कि वह सबके साथ न्याय करती है। पर ये क्या ... मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के बारे में तो यह देवी पिछड़ गई। देवी की देखादेखी पूरी की पूरी कोर्टों ने भी आंखों पर पट्टी बांध ली। पट्टी 12 बरस से पड़ी हुई है। हालांकि, पट्टी तो बहुत पहले ही पड़ी थी, लेकिन 1993 में इंदौर के एक व्यक्ति ने इस पट्टी को खोल दिया था।
इस व्यक्ति का नाम सत्यपाल आनंद है, जो बीते 30 बरस से जनहित के मुद्दों पर लगातार कोर्टों में याचिकाएं दाखिल कर रहा है। आनंद ने 1994 में सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका लगाकर मांग की थी कि संविधान लागू होते वक्त अनुच्छेद 45 में दर्ज मौलिक अधिकार में 10 वर्ष की समय सीमा तय करके कहा गया था कि 14 वर्ष से कम आयु के हर बच्चे को देश में अनिवार्य और मुफ्त शिक्षा दी जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। बावजूद इसके न्यायपालिका, विधायिका एवं कार्यपालिका ने कभी इस अधिकार को अमल में लाने की कोशिश नहीं की। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के समक्ष आनंद ने स्वयं अपने केस की दलीलें दी। इसके लिए देश के सभी राज्यों के एडवोकेट जरनल को सुप्रीम कोर्ट में हाजिर होना पड़ा। 23 मार्च 1998 को कोर्ट ने आनंद के तर्कों से संतुष्ट होते हुए फैसला दिया कि शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य घोषित किया जाए। इसके लिए हर राज्य में अलग से याचिकाएं दाखिल करने की बात भी इस आदेश में दी गई।
आनंद ने इसके बाद आधा दर्जन राज्यों में स्वयं याचिका दाखिल करके मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा लागू करने की मांग की। हालांकि, किसी कोर्ट ने उनकी याचिकाओं को वह सम्मान नहीं दिया, जो कि दिया जाना था।
आनंद ने एक अप्रैल को एक बार फिर से पुरानी बातों को ताजा करते हुए एक ïजनहित याचिका मप्र हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में दाखिल की है। इसमें उन्होंने अपने पुराने अनुभवों को ध्यान देते हुए कहा है कि न्यायपालिका चाहती तो कानून बहुत पहले ही अमल में आ चुका होता। अफसोस, देश के करोड़ों बच्चों के साथ बरसों तक अन्याय होता रहा और कोर्टों ने कोई कार्रवाई नहीं की। नई जनहित याचिका में उन्होंने तर्क दिया है कि देश के सिरमौर शासकों ने कभी नहीं चाहा कि देश का हर बच्चा शिक्षित हो। यदि वे ऐसा चाहते तो उनकी गद्दी खतरे में होती। अभी भी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जो भाषण दे रहे हैं, उसमें कोई सच्चाई नहीं है। वे कह रहे हैं कि इस कानून से देश के करोड़ों बच्चों को न्याय मिलेगा और वे स्कूलों में दाखिल हो सकेंगे। आनंद ने कहा है कि प्रधानमंत्री की मंशा वास्तव में कानून को ईमानदारी से लागू करने की होती तो इसके लिए विशेष कोष की स्थापना की जाती। यह भी तय किया जाता कि अब देश में कोई भी बच्चा मजदूरी नहीं करेगा। परंतु न तो स्कूलों की हालत सुधारी गई है और न ही बच्चों की।
आनंद को उम्मीद है कि उनकी जनहित याचिका पर शीघ्र ही सुनवाई होगी और प्रधानमंत्री, केबिनेट सचिव, मप्र के मुख्यमंत्री और मुख्य सचिïव को कोर्ट में तलब किया जाएगा। हालांकि, आनंद कहते हैं यह याचिका यहां खारिज हो गई तो वे इसे सुप्रीम कोर्ट ले जाएंगे, ताकि पूरे देश को पता चल सके कि देश की कोर्टें सो रही हैं...।

Monday, March 29, 2010

वो दो घंटे पूरी जिंदगी पर भारी रहे...

 यह पोस्ट उस शख्स के नाम जिनकी प्रजाति अब दुनिया में खत्म होने को है। शख्स उज्जैन का है और जब इंदौर आया तो मुलाकात का मौका मिला। उससे हुई बातचीत को लफ्ज दिए हैं। गौर करें...
  पहले तो मेरा परिचय दे दूं। मेरा नाम शहजाद है। मेरी उम्र यही कोई 25-26 होगी। उज्जैन न्यू महाकाल रोड की गली नंबर सात के कोट मोहल्ला में 600 रुपए भाड़े के एक कमरे वाले मकान में रहता हूं। साथ में पत्नी फरिदा, दो बेटियां व एक बेटा भी है। उज्जैन की सड़कों पर दौडऩे वाले मेरे ऑटो का नंबर एमपी-09, केबी-4274 है। इसके किराए के हर दिन साठ रुपए चुकाता हूं।
अब बात उस लम्हे की जब अल्लाह ने मेरा इम्तेहान लिया। गुरुवार (25/03/10)  सुबह जब घड़ी में आठ बज रहे थे, तब मैं ऑटो की सफाई में इस उम्मीद से मशगूल था कि आज ज्यादा सवारियां मिलेगी। तभी ऑटो में एक बेग दिखा। चौंका और इसे खोला। इसमें सोने के गहने देखे तो फिर से चौंका। गहने ही गहने दिख रहे थे। चौंकने के साथ ही घबरा भी गया। बेग उठाया और पास ही रहने वाले ससुर चांद खां के पास भागा। हांफते-हांफते उन्हें बताया कि कोई सवारी गाड़ी में जेवरात का बेग भूल गई है। हिम्मत बंधाई। मैंने कहा यह पुलिस को दे दें, ताकि जिसका हो उसे मिल जाए। पता नहीं उस बेचारे का क्या हाल हो रहा होगा। उस वक्त मुझे कुरआन की वह आयतें याद आ गईं, जिसमें खुदा का हुक्म है कि हराम की कमाई खाना गुनाह है। जो सामान मुझे मिला, वह किसी की अमानत थी और इस्लाम अमानत में खयानत की इजाजत नहीं देता।
सोने से भरा बेग पुलिस के हाथों तक पहुंचाने में करीब दो घंटे का वक्त लगा। ये दो घंटे पूरे जीवन पर भारी रहे। इस दौरान मैंने न जाने कितनी जिंदगियां जी ली। जब सवारी नहीं मिलती है और शाम को खाली हाथ घर लौटता हूं तो अल्लाह की तंगदिली के जो ख्याल आते हैं, वे भी ध्यान आए। छह साल की शाईना, चार की तरन्नुम और दो वर्ष के अयान के चेहरे दिलो-दिमाग में छाने लगे। उन्हें पढ़ा-लिखाकर काबिल जो बनाना है। वह शिक्षा उन्हें दिलाना है, जो मैं नहीं पा सका। फरिदा से किया गहनों का वादा भी याद भी आया। पिता, जिन्हें टेलरिंग के पेश ने जुड़े लोग अब्दुल सत्तार सफारी स्पेशलिस्ट के नाम से जानते हैं, के बारे में सोचा, क्या वे बुढ़ापे में भी आंखे दुखा-दुखाकर सिलाई करते रहेंगे। और भी न जाने क्या-क्या था, जो मन में आया। सारी बातों पर भारी थे बस दो लफ्ज ईमान या हराम। मैंने ईमान को चुना। पुलिस के पास पहुंचे तो पता चला कि गहने 32 लाख रुपए के हैं।
आज मन पर कोई बोझ या वजन नहीं है। गहने छुपा लेता तो हराम की कमाई से घर के हालात बदल लेता, लेकिन कब तक, कभी न कभी तो पुलिस को पता चलता। तब मैं जेल में होता और पूरा परिवार सड़क पर। जो हुआ अ'छा ही हुआ। गहने वाले भैय्या ने एक लाख रुपए के इनाम की जो घोषणा की है, उससे अब एक नया सीएनजी ऑटो रिक्शा खरीदूंगा, ताकि रोज का भाड़ा नहीं देना पड़े। उम्मीद है, अल्लाह मेरा साथ देता रहेगा। ऑटो से होने वाली ईमान की कमाई से ही मैं एक दिन बड़ा आदमी बनूंगा। ईमानदारी से मेरा और मेरे परिवार का सिर जिस तरह फक्र से ऊंचा हुआ है, मैं तो चाहता हूं सारी दुनिया को ईमानदारी से मिलने वाले सकून और शांति का अनुभव हो। 
चलता हूं क्योंकि मुझे ऑटो चलाने जाना है...सवारियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाना है...वे चैन से पहुंचेंगे तो ही मुझे भी चैन मिलेगा।
(बकलम विजय चौधरी)

Sunday, January 24, 2010

मूंगफली वाले को बाहर फिकवा दूंगा!


यह एक ऐसे बुजुर्ग व लब्ध प्रतिष्ठित कवि का कथन है, जो खरी-खरी लिखते हैं और फिर उसे सुनाते भी हैं। बीती रात वे इंदौर के गांधी हाल में बने एक मंच पर थे। कविता कहने से पहले ही उन्होंने सभा में बैठे लोगों के बीच मूंगफली बेचने वाले को डपटते हुए यहां तक कह डाला कि जब हम एक मूंगफली वाले से नहीं निपट सकते, तो पाकिस्तान से भला कैसे निपटेंगे। हुआ भी ऐसा ही, उनकी डपट के बाद भी मूंगफली वाला मजे से काम में जुटा रहा। थोड़ी देर बाद वे फिर बिगड़े और 1000 प्रतिशत राजनीति से नाता रखने वाले कवि महोदय ने कह ही डाला 'मूंगफली वाले को बाहर फिंकवा दूंगा...चौंकिए मत मैं ऐसा कर चुका हूं। जब उन्हें अहसास हुआ कि कुछ ज्यादा डोज दे दिया, तो बात संभालते हुए कहा 'वह भी क्या करे, उसके पास भी पेट है। मंच सेवा-सुरभि, जिला प्रशासन, नगर पालिक निगम और इंदौर विकास प्राधिकरण का था। गणतंत्र दिवस के मौके पर छह कवियों को जुटाया गया। बालकवि बैरागी ने मूंगफली वाले के जरिए व्यवस्था पर गुस्सा उतारते हुए 'मैं मरूंगा नहीं, क्योंकि मैं ऐसा वैसा कुछ करूंगा नहीं  जैसी गंभीर रचना सुनाई। पाठ करने से पहले उन्होंने कह दिया मुझे ताली नहीं चाहिए। उधर, अशोक चक्रधर ने तालियों को लेकर पाकिस्तान की एक यात्रा का जिक्र कर दिया और अपने खाते में तालियां जमा कर ली। बैरागी ने चक्रधर की तारीफ करते हुए इंटरनेट में हिंदी का ठेर सारा श्रेय भी उनकी झोली में डाल दिया। चक्रधर ने भी तारीफ मंजूर करते हुए बताया 'सेव के लिए पहले 'रक्षा करें प्रचलित था, इसे 'सहेजें मैंने ही करवाया, कह दिया।
रतलाम के अजहर हाशमी ने देशभक्ति के तराने सुनाए तो श्याम अंगारा ने अपनी रचनाओं से काव्य मंच का आगाज किया। शैलेष लोढ़ा देर से आए लेकिन उन्हें सुनने के लिए लोग जुटे रहे। चूंकि वे कवि से अधिक अब तारक मेहता का उल्टा चश्मा से प्रसिद्ध हो चुके हैं। जो भी हो, एक कवि के लिए प्रसिद्ध ही सबकुछ है।
किरकिरी मंच पर पहुंचे इंदौरियों ने ही की। संचालन की ठिली डोर थामने वाले प्रो. राजीव शर्मा ने तीन चूहों का घटिया चुटकुला सुनाकर पंचम की फेल के लोगों का भद्दा मजाक उड़ाया। हुटिंग हुई तो बीच में एक दफा उन्हें कहना पड़ा, मैं आपके बीच तीस-चालीस सेकंड ही रहूंगा। संजय पटेल भी बीच में एकेवीएन के एक अफसर को मंच पर बुलाने के बहाने चढ़े और दस मिनट खराब कर गए। महापौर कृष्णमुरारी मोघे आयोजक होने के बावजूद काव्य पाठ शुरू होने के बाद आए और मंच पर चढ़कर स्वागत सत्कार टाइप का कृत्य कर गए।
खैर, बैरागी ने भवानीप्रसाद मिश्र और कन्हैयालाल सेठिया के दो संस्मरण सुनाकर हौंसला बढ़ाया। मिश्र ने कहा था आलोचकों के स्मारक नहीं बनते, इसलिए उनकी परवाह नहीं करना चाहिए, जबकि सेठिया ने लघुकथा में मिट्टी के घड़े को पीतल के घड़े से इसलिए बेहतर बताया था, क्योंकि वह पानी को अपने शरीर में उतार लेता है। चक्रधर और बैरागी दोनों ने ही चिंता जताई कि कवि सम्मेलनों में महिलाओं की उपस्थिति चिंता का कारण रहा है, क्योंकि महिला का उपहास धड़ल्ले से हो रहा है।